अचानक Nitish Kumar के गुणगान करने लगे आरसीपी सिंह, JDU में वापसी की हो रही तैयारी?
बिहार की सियासत में जब पुराने रिश्ते करवट लेते हैं, तो सवाल सिर्फ वापसी का नहीं होता…मजबूरी, ज़रूरत और भविष्य की गणित का भी होता है। कभी सत्ता के गलियारों में नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार, तो कभी जेडीयू के ‘नंबर दो’ कहे जाने वाले। आरसीपी सिंह आज फिर उसी दरवाज़े पर खड़े नज़र आ रहे हैं, जहां से उनकी सियासी पहचान बनी थी। मुख्यमंत्री के साथ एक मंच पर दिखना, और नीतीश कुमार को ‘अभिभावक’ कहना—ये महज़ शिष्टाचार है या घर वापसी की भूमिका? सवाल कई हैं—क्या जेडीयू में लौटना आरसीपी सिंह की मजबूरी बन चुका है? या फिर बदलते सियासी समीकरणों में नीतीश कुमार को फिर से आरसीपी सिंह की ज़रूरत महसूस हो रही है?

हाल ही में पटेल सेवा संघ की ओर से आयोजित 'दही-चूड़ा भोज' में नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह दोनों शामिल हुए। दोनों नेता अलग-अलग समय पर पहुंचे, लेकिन कार्यक्रम के बाद आरसीपी सिंह के बयानों ने सबको चौंका दिया। जब मीडिया ने उनसे जेडीयू में वापसी पर सवाल किया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, 'जल्द ही पता चल जाएगा।' इसके साथ ही उन्होंने नीतीश कुमार को 'भारत रत्न' देने की मांग का भी पुरजोर समर्थन किया और नीतीश कुमार को अपना अभिभावक बता दिया।
आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार का रिश्ता करीब ढाई दशक यानी 25 साल पुराना है। मूल रूप से नालंदा के मुस्तफापुर के रहने वाले आरसीपी सिंह, नीतीश कुमार की ही तरह 'कुर्मी' समुदाय से आते हैं। 1984 बैच के यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी रहे सिंह की मुलाकात नीतीश कुमार से 1996 में हुई थी। नीतीश ने उनकी कार्यशैली को इतना पसंद किया कि उन्हें रेल मंत्रालय में अपना विशेष सचिव और फिर बिहार का मुख्यमंत्री बनने पर प्रधान सचिव बनाया। 2010 में वीआरएस लेकर आरसीपी सिंह राजनीति में आए, राज्यसभा पहुंचे और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद तक का सफर तय किया। देखा जाए तो नीतीश कुमार की की जेडीयू में रखते हुए आरसीपी सिंह को बहुत कुछ मिला।
आरसीपी सिंह जब तक जेडीयू में रहे, उनका रुतबा बना रहा। हालांकि नीतीश कुमार के साथ रिश्तों में खटास आई तो उन्होंने जेडीयू से इस्तीफा दे दिया। जेडीयू छोड़ने के बाद वे बीजेपी में शामिल हुए, लेकिन वहां उन्हें वह अहमियत और भरोसा नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी। बीजेपी में भाव न मिलता देख आरसीपी सिंह ने बिहार में अपनी पार्टी बना ली। लेकिन शायद जमीनी हकीकत का अंदाजा लगते ही उन्होंने प्रशांत किशोर की जन सुराज में अपनी पार्टी का विलय कर दिया। पीके की जन सुराज से आरसीपी सिंह ने अपनी हैसियत को आजमाने के लिए नीतीश कुमार की पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ अस्थावां सीट से अपनी बेटी लता सिंह को मैदान में उतारा। हालांकि चुनाव में लता सिंह को करारी हार का सामना करना पड़ा। उनकी जमानत भी जब्त हो गई।
Divya Singh